जाने क्या चाहती है ज़िन्दगी मुझसे, क्यों इतना संघर्ष करवा रही है, जिस पल लगता है की कुछ पा लिया है मैने, उसी पल जाने सब कुछ चुरा रही है ... खुशियों के साए में सपने पूरे होंगे कभी हम ये सोचा करते थे और उन सपनो को पाने की छह मे, पल पल जिया करते थे .... शायद किस्मत को कुछ और था मंजूर, तभी तो मंजिल का रास्ता छूट गया पर ना जाने क्यों पल पल लगता है, जेसे सपना शुरू होने से पहले टूट गया.. चलती रही मै कदम बढ़ा कर हौसले ना जाने क्यों पस्त हो गये हिम्मत न हारी थी मैने फिर भी न जाने क्यों , सितारे चमकने से पहले ही अस्त हो गये.... चाहत थी मेरी की छूने की आसमान, पर ना जाने कैसे बादल बरस गये , टूट गये है अब तो इस कदर, मंजिल देखने भर को तरस गये..... जाने क्या आया है आज मन मे, की हम अपनी दर्द- ऐ - दास्ताँ बयाँ कर रहे है, शायद इस ज़िन्दगी मे अपने विचारों को, शब्दों के मोतियों से पिरो कर एक माला तैयार कर रहे है....
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