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उड़ने ना दिया!

अपनी ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को मैंने जिया ... बहुत खुश होकर मैंने हर गम पीया .. ना जाने क्या चाहती थी मुझसे मेरी ज़िन्दगी .. हंस हंस कर भी मैंने हर सितम को जिया . चले जा रहे थे अपने जीवन पथ पर अपनी मंजिल पाने की चाह में .... लेकिन हासिल कुछ न कर पाये सिवाए बेरुखी के  ... आसुओं का सैलाब था मेरी  हर आह में .... हंसती रही ये दुनिया मुझे पड़ने वाली हर ठोकर पर .... और मैं चुप चाप सिसक कर रोती रही ... हसने की... खुश होने की हर उम्मीद को बस यूं ही खोती रही.. क्या गलती थी मेरी ..?  क्या सिर्फ यही की सपना देखा था मंजिल को पा लेने का .....  मेहनत की थी .. सोचा था....  ज़मीन से उठ कर आगे बढ़ना है ... या फिर एक आरज़ू थी की फर्श से अर्श को छूना है ... हर कदम पर मेरे पंखों को काट डाला इस बेरहम दुनिया ने .. ना उड़ने दिया मुझे .. ना जीने दिया ....... मरती रही चिड़िया पिंजरे के अंदर सिसक सिसक कर .. लेकिन इस दुनिया ने उसे उड़ने ना दिया ....    

कितना ट्रैफिक जाम है.....

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चले जा रहे है ट्रैफिक से भरी सड़क पर .....शाम को ऑफिस  से अपने घर की ओर जा रहे थे की चलते चलते सड़क पर अचानक रुक गए ...ट्रैफिक जो इतना था की हमे रास्ता ना मिला आगे बढ़ने का ...फिर कुछ देर रुके और जब पीछे देखा तो लम्बी कतार लग गयी थी लोगों की ......उन्हें देख मन में ख़याल आया की गाड़ियों का तो सडको पर जाम सुना था पर इस नॉएडा शहर में तो इंसानो का भी ट्रैफिक जाम लगा करता है ...सोचते सोचते मुस्कुराने लगे और यही पंक्तियां हमारे मुह से निकल गयी ...की अचानक पीछे से एक आवाज़ आई ....मैडम जी यहां इंसान कम है और गाड़ियां ज्यादा कब कौन गाडी किस पैदल आदमी को कुचल जाए कुछ नाही पता ...और वो चला गया ...गौर फरमाया जब उसे हमने तो गाड़ियों को धक्का दिए कुछ बड़बड़ाये वो चला गया अपनी धुन में अपने पैर को लंगड़ाते हुए जिस से खून निकल रहा था ....तभी पीछे लगी भीड़ पर गौर फरमाया तो एक बुजुर्ग ने फरमाया मुझे बचाने लगा था बेचारे के पैर पर गाडी वाले ने मार दिया ...भीड़ धीरे धीरे हटने लगी और यूहीं तेज़ रफ़्तार से गाड़िया चलती रही ...सड़क पार करने में  काफी वक्त लगा और फिर पीछे मुड़े तो देखा फिर से कतार लगी थी सिर्फ गा...