सांत्वना
कहते है ज़िन्दगी थम जाती है ... लेकिन वक्त नहीं थमता ... यूं तो ज़िन्दगी भी नहीं थमती पर एक पल इतना लम्बा हो जाता है की लगता है गुजरने में नहीं आ रहा . दरअसल पल ही ऐसा होता है दुःख का... ना चाहते हुए भी जिस पर टूट पड़ता है लगता है की बस सब रुक सा गया हो जैसे ... कुछ ऐसा ही हुआ जब हम भी पहुंचे एक ऐसी जगह जहां पहली बार रूबरू हुए उस पल से जो असल में ज़िन्दगी की हकीकत है .. मौत ... दरअसल बाबूजी बीमार थे ... डाक्टर ने कहा इलाज सर्जरी है ... थोड़ा दिल डरा पर चेहरे पर मुस्कराहट के साथ हमने हिम्मत ना हारी .. कहा बाबूजी चलिए बिना डरे आप इलाज़ कराएं आप ठीक हो जाएंगे ... बाबूजी को हिम्मत बंधाई लेकिन क्या करे भाई डरतो सबको लगता है .. अब हम डियू तो पिके आये नहीं की हमे डर नहीं लगता .. दिल धड़क रहा था पर बाहर से हम भी अम्बुजा सीमेंट की तरह मजबूत बने बस मुस्कुराते रहे .. पिताजी अंदर ऑपेरशन थीएटर में सर्जरी करवा रहे थे और में बाहर इन्तजार कर रहे थे .... पूरे साढ़े तीन घंटे का इंतज़ार ... घबराहट इतनी की बस शब्द जुबां पर आने से घबराते थे ... नज़र दरवाज़े पर अिुर फिर सामने बैठी उन बूढ़ी निगाहों पर...