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  अहसास, इस पल का ... एक ज़माना हो गया लिखे हुए , एक पल था जब हर वक़्त शब्द गूंजा करते थे , हम गुनगुनाते थे और शब्द गीत गाते थे लगता है अब कलम भी फ़ना हो गए आज जाने क्यों सब मौन हो गए..... आज ढूंढ़ती हूं खुद को खामोशी में कभी हंसती मुस्कुराया करती थी बोलती इतना थी कि लोग चुप कराते थे आज चाह कर भी बोलने का मन नहीं करता जाने क्या है की हर चीज़ से मन उठ गया जाने क्या थे और आज हम क्या हो गए ...... एक कशिश थी आँखों में सपने थे हज़ार रोज़ टूटे तारों को देखने की रहती थी दरकार अब न सपने हैं और न कोई अरमान रहा जाने कब आख़िरी बार किसी को अपना दर्द कहा आज लगता है खुद टूट के बिखर गए ...... जो कभी खुशियों के खुदा हुआ करते थे आज ग़म के जहां हो गए ....... 😢😥😰😪😭🙏 दीक्षा