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उड़ने ना दिया!

अपनी ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को मैंने जिया ... बहुत खुश होकर मैंने हर गम पीया .. ना जाने क्या चाहती थी मुझसे मेरी ज़िन्दगी .. हंस हंस कर भी मैंने हर सितम को जिया . चले जा रहे थे अपने जीवन पथ पर अपनी मंजिल पाने की चाह में .... लेकिन हासिल कुछ न कर पाये सिवाए बेरुखी के  ... आसुओं का सैलाब था मेरी  हर आह में .... हंसती रही ये दुनिया मुझे पड़ने वाली हर ठोकर पर .... और मैं चुप चाप सिसक कर रोती रही ... हसने की... खुश होने की हर उम्मीद को बस यूं ही खोती रही.. क्या गलती थी मेरी ..?  क्या सिर्फ यही की सपना देखा था मंजिल को पा लेने का .....  मेहनत की थी .. सोचा था....  ज़मीन से उठ कर आगे बढ़ना है ... या फिर एक आरज़ू थी की फर्श से अर्श को छूना है ... हर कदम पर मेरे पंखों को काट डाला इस बेरहम दुनिया ने .. ना उड़ने दिया मुझे .. ना जीने दिया ....... मरती रही चिड़िया पिंजरे के अंदर सिसक सिसक कर .. लेकिन इस दुनिया ने उसे उड़ने ना दिया ....