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हम इलज़ाम से अनजान थे , वो अंजाम से थे बेखबर ... कितना रोये इस दर्द से , उनको क्या थी खबर ... फिर सोचा फैसले को , वक़्त के हवाले छोड़ दें ... उल्फत की इन बेड़ियों को , चलो खुद ही तोड़ दें ... छोड़ दे उन ख्यालों को जो हमे सताते है जो कुरेदते है हर  ज़ख़्म और ताज़े घाव बनाते है नमी नहीं अब इन आँखों में ख़ुशी की दरकार है किसी से क्या लेना मुझे खुद से इतना प्यार है
कभी कभी रोने का दिल करता है कुछ ख्वाब्वों में जीने का दिल करता है अश्क जो निकलते है ... डूब जाने का दिल करता है गिर कर संभालना आता नहीं .. फर भी उस रस्ते चलने का दिल करता है समझ जो पाते नहीं फर वो सवाल पूछने का दिल करता है दुनिया कहती है दिमाग से काम लो फर भी दिमाग को नज़र अंदाज़ कर दिल की सुनने का दिल करता है .. समझ नहीं पाते हालातों को ... फिर भी उनमे जीने का दिल करता है जाने कैसा है ये दिल.... की ना चाहते हुए भी इसकी सुनने का दिल करता है