Kab Milegi Manzil???????????

जाने क्यों ज़िन्दगी की हर राह पर गमो का सैलाब सा आता है नज़र
आखिर कब मिलेगी मंजिल हमें ....क्यों हर कदम पर होता है हशर….
हम चले जा रहे है न जाने क्यों क्या सोचकर
लगता नहीं कामयाबी मिल जाएगी यूं सोच  सोचकर।।
हस्ते रहने की खायी थी कसम
पर पीछा नहीं छोड़ते है ये गम
ना जाने सहने है और कितने सितम
क्या ठोकर खाने के लिए ही है हम
 बार बार ये प्रश्न  आता है ज़हन में ...
की आखिर कितने गम है उस मंजिल को पाने के रास्ते ?
हम सोचा करते थे पा लेंगे हर ख़ुशी मेहनत  के रस्ते
पर सोच सिर्फ सोच ही रह जाएगी .....
मंजिल शायद हमे मिल ही जाएगी ....
गर ना मिली मंजिल तो बस आस रह जाएगी ..
और मंजिल पाने की चाह सपनो तक रह जाएगी ...............

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