क्या हम सच में इंसान है ????

ज़िन्दगी भर जिए हम इस चाहत में की मज़िल को हासिल कर लेंगे 
लेकिन आज पता चला की इस सफर में अगर इंसानियत ही हासिल कर लेंगे तो बहुत है 
कोई कहता है की वो बीमारी से मरा , कोई कहता है की वो भुखमरी से मारा 
लेकिन जो देखा आज मैंने दृश्य 
तो यही कहूँगी की वो ट्रैफिक से मरा 
???



मौन हूँ ....
शब्द नहीं ...
बस एक एहसास है ...
नहीं जानती की आज जो देखा 
वो किसी और ने भी देखा 
या फिर ये रोज़मर्रा की घटना थी सबके लिए ....
एम्बुलेंस का साइरन बज रहा था
सिग्नल भी हरा था ....
अंदर बैठा मरीज़ दर्द से तड़प रहा था 

ड्राइवर लाचार था ...
और आगे पीछे से आने वाले शायद गूंगे बेहरे हो गए थे ...
शायद अंधे भी .........
ना तो उनको एम्बुलेंस की आवाज़ आ रही थी 
ना एम्बुलेंस दिख रही थी ...
बस दिख रहा था तो अपना गंतव्य ...
दिख रहा था तो कैसे खुद निकला जाए ....

सवाल तो कई है ?
हम मौत को कसूर देते है .....
लेकिन क्या ज़िन्दगी को मौत ले गयी 
या ट्रैफिक उसका कारण बना 
या फिर कसूरवार वो लोग थे जिन्होंने उसे अस्पताल पहुँचने ना दिया ????

क्या यही इंसानियत है ???????
इस से तो बेहतर हैवान है जो मार देते है इस कदर सड़क पर तड़पाते नहीं मौत के लिए ....
सोचियेगा क्या हम सच में इंसान है ????

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