जाने कैसा दर्द है जो एहसास बनकर घेर रहा है
की आह नहीं होती, आंखें छलक जाती हैं
कभी खुशनुमा बस्तियों में मौज लुटाया करते थे
आज वीराने में खुशी की झलक भी नज़र नहीं आती
गम ए जिंदगी किसी ने बांटी नहीं
और हम चले थे खुशियां लुटाने
जिन अपनों पर कुर्बान की अपनी खुशियां
वही लगे थे मेरी हस्ती मिटाने
बेखौफ जीने के आदी थे
मुस्कुराहट थी साथी मेरी
जाने कब जिंदगी से टूटा नाता
और मौत बनी सारथी मेरी
लोग कहते हैं की जिंदा हूं में
बस बदला मेरा ज़रा मिज़ाज़ है
बस ये कोई नहीं मानता की इस बदलाव का कारण
वो ही लोग और उनका अपना समाज है।

दीक्षा

Comments

Popular posts from this blog

आज़ादी

अनाछी: An Unwanted.......